तुझ से मिलने का सिलसिला रखता हूँ।
मैं जख़्म खाने का.....हौसला रखता हूँ।।
वो दोस्त तो है मगर......सियासी भी है।
इसलिये मैं उससे ....फासला रखता हूँ।।
हुई मुद्दत .....कोई नही आया अब तक।
मैं अब भी दरवाज़ा......खुला रखता हूँ।।
फूल आखिर फूल हैं ......मुरझायेगे ही।
साथ मैं....काँटों का काफिला रखता हूँ।।
ये आदत 'सागर' अब...नही जाने वाली।
हर शाम दिया उम्मीद का जला रखता हूँ।।